पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों की तैयारी तेज हो गई है। राज्य में 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में मतदान होने वाला है। इस बार की चुनावी जंग में राज्य की राजनीति के शीर्ष दलों ने अपनी सामर्थ्य और रणनीति को दर्शाने के लिए विविध प्रोफाइल के उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। प्रश्न उठता है कि इन उम्मीदवारों की आर्थिक पृष्ठभूमि क्या है और किस दल ने कितने दागी और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले प्रत्याशियों को टिकट दिए हैं।
तृणमूल कांग्रेस जो बंगाल में सत्तारूढ़ दल है, ने अपने चुनावी दस्ते में कुछ बेहद संपन्न उम्मीदवारों को शामिल किया है। इनमें से एक उम्मीदवार की संपत्ति 104 करोड़ रुपये आंकी गई है, जो इस चुनाव में सबसे अमीर प्रत्याशी माना जा रहा है। यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि तृणमूल के कई उम्मीदवारों के पास भारी वित्तीय संसाधन हैं और वे अपनी चुनावी मशीनरी को मजबूत बनाने में सक्षम हैं। हालांकि, धन संपन्नता का सीधा संबंध जनता की सेवा से नहीं माना जा सकता, फिर भी चुनावी खर्चे को देखते हुए यह महत्वपूर्ण हो जाता है।
भारतीय जनता पार्टी के मामले में स्थिति अलग दिख रही है। भाजपा ने अपने कई उम्मीदवारों के मामले में आपराधिक पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना उन्हें टिकट दिया है। दागी या आपराधिक मामलों में आरोपित उम्मीदवारों की संख्या भाजपा की सूची में काफी अधिक बताई जा रही है। यह प्रवृत्ति चुनावी राजनीति में एक चिंताजनक पहलू माना जाता है क्योंकि इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं।
भारतीय चुनाव आयोग के आदेशानुसार, सभी उम्मीदवारों को अपनी संपत्ति का विवरण और आपराधिक मामलों का खुलासा करना अनिवार्य है। इसी जानकारी के आधार पर मतदाता अपना सूचित निर्णय ले सकते हैं। पश्चिम बंगाल के चुनावों में इस बार उम्मीदवारों की विविधता देश की राजनीति का एक सूक्ष्म चित्र प्रस्तुत कर रही है। राज्य के मतदाताओं को यह विश्लेषण करना होगा कि उन्हें ऐसे प्रतिनिधि चाहिए जो वित्तीय रूप से मजबूत हों या नैतिक रूप से स्वच्छ हों।