हिंदी साहित्य की समृद्ध परंपरा में शिवमंगल सिंह 'सुमन' का स्थान विशेष महत्व रखता है। स्वतंत्रता संग्राम के समय काव्य रचना से लेकर आजीवन समाज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाने वाले सुमन जी की कविताओं में जीवन के विभिन्न पहलुओं को गहराई से समझा जा सकता है। उनकी कविता 'सांसों का हिसाब' इसी चेतना का एक प्रमुख उदाहरण है, जहां वे वाष्प की प्रतीकात्मकता के माध्यम से मानव जीवन की सूक्ष्मता को रेखांकित करते हैं।
वाष्प, जो जल का सूक्ष्मतम रूप है, कविता में जीवन की प्रतीक के रूप में प्रस्तुत होता है। ठीक वैसे ही जैसे जल का वाष्पन होता है और वह आकाश में विलीन हो जाता है, मानव जीवन भी इसी तरह क्षणभंगुर है। सुमन जी की काव्य भाषा में वाष्प केवल एक भौतिक तत्व नहीं, बल्कि एक दार्शनिक बोध है जो हमें जीवन की वास्तविकता से परिचित कराता है। प्रत्येक सांस हमारे अस्तित्व की एक इकाई है और इन सांसों का हिसाब लगाना अर्थात् जीवन को सार्थक बनाना ही कवि का संदेश है।
सुमन जी की इस रचना में एक सामाजिक दायित्व भी निहित है। उनकी कविताएं केवल व्यक्तिगत भावनाओं तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि समाज के प्रति एक सचेत दृष्टिकोण प्रदर्शित करती हैं। 'सांसों का हिसाब' कविता में भी यह संदेश परोक्ष रूप से दिया गया है कि हर सांस मूल्यवान है और इसे व्यर्थ नहीं करना चाहिए। समाज को सकारात्मक दिशा देने के लिए हमें अपने हर क्षण को सार्थक बनाना चाहिए।
हिंदी काव्य जगत में शिवमंगल सिंह 'सुमन' की यह कविता आज के समय में भी अत्यंत प्रासंगिक है। आधुनिक जीवन की भाग-दौड़ में जहां मनुष्य अपनी सांसों को गिनना भूल गया है, सुमन जी की रचना हमें पुनः जीवन के महत्व को समझने के लिए प्रेरित करती है। उनकी काव्य भाषा सरल, प्रभावी और हृदय को स्पर्श करने वाली है, जिससे आम पाठक भी उनकी बातों को समझ सकता है। यह कविता हमें एक महत्वपूर्ण संदेश देती है कि जीवन को पूरी सचेतता और ईमानदारी के साथ जीना चाहिए।