महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य की सबसे महत्वपूर्ण कवयित्रियों में से एक हैं। उनकी कविता 'मैं न यह पथ जानती री' उनकी काव्य संवेदनशीलता और आंतरिक द्वंद्व को प्रकट करती है। इस कविता में महादेवी वर्मा ने जीवन के अप्रत्याशित मार्ग और उसके साथ आने वाली अनिश्चितता को गहराई से व्यक्त किया है। नारी जीवन की पीड़ा और आत्मबोध इस रचना का केंद्रीय विषय है।
कविता में 'मेरु' शब्द का प्रयोग महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक अर्थ रखता है। महादेवी वर्मा ने पर्वत के रूप में मेरु को अपने जीवन संघर्ष का प्रतीक बनाया है। यह शब्द साधारण भौगोलिक संदर्भ नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक ऊंचाइयों और मानवीय संघर्षों का प्रतिनिधित्व करता है। महादेवी की काव्य-भाषा सरल होते हुए भी गहरे अर्थों को समेटे हुए है।
'मैं न यह पथ जानती री' कविता की एक विशेषता इसकी आत्मीय संवेदनशीलता है। महादेवी वर्मा ने यहाँ अपने निजी अनुभवों को सार्वभौमिक भावनाओं में रूपांतरित किया है। कविता पढ़ते समय पाठक को यह अनुभूति होती है कि यह पीड़ा केवल महादेवी की नहीं, बल्कि प्रत्येक संवेदनशील मन की है। उनकी शब्दावली चुनी हुई और प्रभावशाली है, जो पाठकों के हृदय को स्पर्श करती है।
महादेवी वर्मा का काव्य संग्रह 'निहार' और अन्य रचनाएं आधुनिक हिंदी साहित्य के स्वर्णिम पृष्ठ हैं। इनकी कविताओं में रहस्यवाद, आध्यात्मिकता और सामाजिक चेतना का अद्भुत मेल है। 'मैं न यह पथ जानती री' जैसी कविताएं पाठकों को न केवल साहित्यिक आनंद देती हैं, बल्कि जीवन के गूढ़ प्रश्नों पर विचार करने के लिए भी प्रेरित करती हैं। महादेवी की यह काव्य-विरासत आज भी समान रूप से प्रासंगिक और प्रभावशाली बनी हुई है।