ईरान और अमेरिका के बीच चल रही शांति वार्ता में नई उलझन सामने आई है। दोनों देशों की नियुक्त प्रतिनिधि टीम बैठक की कोई निश्चित तारीख तय नहीं कर पाई है, जिससे कूटनीतिक प्रक्रिया में ठहराव की स्थिति बनी हुई है। विदेश मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, वार्ता को लेकर दोनों पक्षों के बीच बुनियादी मतभेद अभी भी विद्यमान हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर दोनों देशों के बीच गहरा विवाद उभरा है। यह रणनीतिक जलमार्ग विश्व के सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापार मार्गों में से एक है, जहां प्रतिदिन लाखों बैरल कच्चे तेल का परिवहन होता है। ईरान इस क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाना चाहता है, जबकि अमेरिका और उसके सहयोगी देश इसका विरोध कर रहे हैं। यह विवाद वर्तमान वार्ता का सबसे पेचीदा मुद्दा बन गया है।
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि इस विवाद का समाधान न हो सका तो क्षेत्र में सैन्य टकराव की स्थिति भी बन सकती है। पश्चिमी देशों और खाड़ी सहयोगी परिषद के सदस्य देश इस स्थिति को लेकर चिंतित हैं। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने भी दोनों देशों से संयम और संवाद की अपील की है। भारत सहित अन्य बड़ी आर्थिक शक्तियां भी इस संकट को गंभीरता से लेख रही हैं, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य से भारत का तेल आयात भी प्रभावित हो सकता है।
राजनयिक सूत्रों के अनुसार, अगली बैठक शीघ्र ही आयोजित होने की संभावना है, लेकिन दोनों देश अपनी-अपनी शर्तों पर अडे हुए हैं। समझौते के लिए मध्यस्थ राष्ट्रों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि मौजूदा गतिरोध को तोड़ना है तो दोनों पक्षों को कुछ रियायतें देनी होंगी। आने वाले हफ्तों में इस स्थिति में महत्वपूर्ण बदलाव की उम्मीद जताई जा रही है।